आज मेरी मां मुझसे काफी खुश थी उनका लाडला बेटा स्कूल से आते वक्त रास्ते में कोई भी चीज छू नहीं रहा था या रोज की तरह पत्थरों पर लात मारता हुआ नहीं जा रहा था. जब उन्होंने मुझसे यह पूछा तो मैंने भी काफी मासूमियत से जवाब दिया कि मुंबई में बम फूटे हैं और स्कूल में कहा गया है कि कोई भी चीजों को हाथ नहीं लगाना

यह सुनकर मेरी मां के हाथ पैर फूल गए क्योंकि हमारे पिताजी उस समय मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के अगल बगल जाया करते थे

12 मार्च 1993 मेरी उम्र केवल 9 बरस थी परंतु मैंने इस्लामिक आतंकवाद के चेहरे को थोड़ा समझ लिया था बहरहाल हमारे पिताजी सब कुशल मंगल सुरक्षित घर पर आ गए, पर घर का माहौल एक अजीब से सन्नाटे में परिवर्तित हो चुका था

मगर हम भारतीयों की एक बहुत अच्छी आदत यह भी है की हम कितने भी बड़े हादसे को बड़ी आसानी से भूल जाते हैं ,पता नहीं मैं इसे असंवेदनशील कहूं या फिर चीजों को यूं ही स्वीकार लेने की एक कला

1970 से 1990 के दशक तक मुंबई में बेरोजगारी के चलते गुंडागर्दी और टपोरी भाई बनने की बातें काफी आम थी ,परंतु 1980 से दाऊद इब्राहिम ने एक छोटे गैंग से डी कंपनी बना दी इसमें पूरी पॉलिटिकल सिस्टम और सामाजिक सोच का बहुत बड़ा रोल था

हर कोई छोटे मवाली को या तो दाऊद जैसा बनना था या डी कंपनी से जुड़ना था. दाऊद गैंग अब 1990 में डी कंपनी बन चुकी थी. हर छोटे मामले से लेकर पॉलिटिकल मामला या इलेक्शन मैनेज करना पूरी तरह से डी कंपनी संभाल रही थी. आप सोच सकते हैं कि एक अंडरवर्ल्ड वाले समानांतर सरकार चला रहे थे

मुस्लिम तुष्टिकरण में लुप्त उस समय की कांग्रेस सरकार आंख मूंदे बैठी थी और वह भी दिन आया जब पाकिस्तान में बैठे-बैठे आई एस आई की मदद से एक सड़क छाप गुंडे. दाउद ने ढाई सौ से ज्यादा बेगुनाहों को मारकर हिंदुस्तान के जमीन पर इस्लामिक आतंकवाद की क्रूर चेहरे को स्थापित किया

आज 24 साल बाद अबू सलेम समेत गुनहगारों को सजा मिली है, परंतु आज भी मेरा 9 साल की उम्र वाला बचपन, और करोड़ों मुंबई वासी एवं पूरा देश यह सवाल पूछेगा कि क्या गुनहगारों को सजा मिल गई.

आप कहेंगे की याकूब मेमन को फांसी लग चुकी है,
पर मेरा फिर से यह सवाल है कि उस हजारों लोगों की भीड़ को मैं क्या कहूं जो एक आतंकवादी के सपोर्ट में उस की शव यात्रा पर जमा हुई थी

आज भी दाऊद या उससे संबंधित अंडरवर्ल्ड की मूवी हिट पर हिट होते जा रही है, आज भी आप मुंबई के डोंगरी नागपाडा के एरिया में घूमे तो आपको दाऊद को अपना हीरो मानने वाले लौंडे दिख जाएंगे

याकूब मेमन की शव यात्रा पर उमड़ी हुई हजारों की भीड़ जब तक आप को सिर्फ एक आम भीड़ नजर आएगी तो यकीन मानिए हमारी सोच आतंकवाद को खत्म करने वाली नहीं, परंतु बढ़ावा देने वाली है
इस्लामिक गुंडों को हीरो समझना और मुस्लिम तुष्टीकरण जब तक बंद नहीं होगा तब तक यह इस्लामिक आतंकवाद रक्त बीज की तरह फैलता जाएगा

जरूरत है कि हर इंसान गांधारी की तरह आंख में पट्टी बांधकर सच से मत भागे और बढ़ते हुए कट्टर और क्रूर इस्लामिक चेहरे को पहचाने. याद रखिए सरकारें आपकी और हमारी सोच से बनती
जब तक हम इस सच को नहीं समझ लेते, तब तक मुंबई हमले ही नहीं देश में किसी भी इस्लामिक आतंकवाद पर न्याय मांगना या न्याय की प्राप्ति होना मात्र एक छलावा है