बात जनवरी 2016 की है. केरल के कोट्टयम जिले की रहने वाली अखिला की उम्र तब 23 साल थी और वह बीएचएमएस (बैचलर ऑफ़ होम्योपैथिक सर्जरी एंड मेडिसिन) की पढ़ाई कर रही थी. दो जनवरी को अखिला घर से अपने कॉलेज के लिए निकली लेकिन वहां पहुंची नहीं. तब अखिला के पिता अशोकन ने अपनी बेटी के गुमशुदा होने की रिपोर्ट स्थानीय थाने में दर्ज करवाई. कुछ दिन बाद अशोकन ने पुलिस को बताया कि उनकी बेटी को उसी के साथ पढ़ने वाली जसीना और फसीना नाम की दो बहनों ने अपने पिता के साथ मिलकर अगवा कर लिया है.

अशोकन की शिकायत पर पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन अखिला का अब भी कोई पता नहीं चला. इसके बाद अशोकन ने केरल उच्च न्यायालय में एक याचिका (हैबियस कॉरपस) दाखिल की. इस याचिका में उन्होंने बताया उनकी बेटी ने बीएचएमएस की पढ़ाई के लिए कुछ साल पहले तमिलनाडु के शिवराज होमियोपैथी मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया था. शुरूआती कुछ समय तक कॉलेज के हॉस्टल में रहने के बाद अखिला ने अपनी चार साथियों साथ मिलकर एक किराए के कमरे में रहना शुरू कर दिया. इन चार साथियों में दो हिन्दू लड़कियां थी और दो मुस्लिम लड़कियां थी. इनमें से जसीना नाम की लड़की से अखिला की काफी अच्छी दोस्ती हो गई और वह अक्सर उसके घर आने-जाने लगी.
अपनी याचिका में अशोकन ने यह भी आरोप लगाए कि जसीना, उसकी बहन फसीना और उनके पिता अबुबकर ने मिलकर अखिला को बहकाया है और उसका जबरन धर्मांतरण करवा लिया है. इस याचिका की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पुलिस को आदेश दिए कि वह जल्द-से-जल्द अखिला का पता लगाए. इसके बाद अगली ही सुनवाई में अखिला न्यायालय पहुंच गई. उसने न्यायालय में हलफनामा दाखिल करते हुए बताया कि उसने सर्जरी के एक कोर्स में दाखिला ले लिया है जिसे पूरा करना बीएचएमएस के हर छात्र के लिए जरूरी होता है. (बाद में पाया गया कि अखिला के हलफनामे में कही गई यह बात झूठ थी और अखिला ने उस कोर्स में दाखिला नहीं लिया था.)

अखिला ने न्यायालय को यह भी बताया कि पढ़ाई के दौरान जब वह जसीना और फसीना के साथ रहा करती थी तो उन्हें नियमित नमाज़ पढ़ते देख वह बहुत प्रभावित हुई
अखिला ने न्यायालय को यह भी बताया कि पढ़ाई के दौरान जब वह जसीना और फसीना के साथ रहा करती थी तो उन्हें नियमित नमाज़ पढ़ते देख वह बहुत प्रभावित हुई. इससे उसका इस्लाम की तरफ रुझान बढ़ा और उसने इस्लामिक किताबें पढना और इंटरनेट पर इस्लाम से जुड़े वीडियो देखना शुरू किया. धीरे-धीरे वह इस्लाम से इतनी प्रभावित हुई कि उसने खुद इस्लाम धर्म स्वीकारने का मन बना लिया. उसने बताया कि उसने एक इस्लामिक संस्था से इस्लाम की तालीम भी हासिल की है.

‘सत्य सारणी’ नाम की इस संस्था ने ही उसे सैनाबा नाम की एक महिला से मिलवाया था जिसके साथ अखिला कुछ दिनों तक रही भी. अखिला ने न्यायालय को बताया कि अब वह अपने माता-पिता के पास वापस नहीं लौटना चाहती.
अखिला की बातें सुनने के बाद न्यायालय ने माना कि एक बालिग लड़की के तौर पर उसे यह तय करने का अधिकार है कि वह कहां रहना चाहती है. लिहाजा न्यायालय ने उसके पिता की याचिका ख़ारिज कर दी और अखिला को ‘सत्य सारणी’ में ही रहने की अनुमति दे दी(Disadvantage of Democracy) ..

सत्य सारणी’ संस्था इस्लाम का प्रचार-प्रसार करती है और इस संस्था पर कई बार ज़बरन धर्मांतरण करवाने के आरोप भी लग चुके हैं.) न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा कि अखिला के माता-पिता समय-समय पर अखिला से मिलने संस्था में जा सकते हैं. to be continued……

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