भारतीय सेना की क्षमता पर किसी को संदेह नहीं है और चारो और से यही चर्चा है कि ‘यदि निर्देश और छूट मिले तो भारतीय सेना आतंकी नेटवर्क को तहस नहस करते हुए पाकिस्तान में तिरंगा झंडा फहरा दे। ‘ सेना के प्रति लोगो ने यह भरोसा अकारण नहीं है। भारतीय सेना के जांबाज सैनिक ऐसा कर भी चुके है कि उन्होंने पाकिस्तान के लाहौर शहर के बर्फी थाने पर तिरंगा फहरा दिया था।

किस्सा सं 1965 के युद्ध का है जब पाकिस्तान ने भारत पर हमले की नाकाम कोशिश की थी। इसके बाद भारत की और से जबरदस्त पलटवार हुआ और पाकिस्तान को मुँह की खानी पड़ी । युद्ध के दौरान अमृतसर से सटी भारत- पाकिस्तान सीमा क्षेत्र में 18 कैवैलरी के कमांडर हरिसिंह देवड़ा अपनी सैन्य टुकड़ी का नेतृव्त कर रहे थे। उनके जांबाज लड़ाके पाकिस्तानी सैनिको को मौत के घात उतारते हुए लगातार लाहौर की और बढ़ चुके थे। चुकी अमृतसर से लाहौर की दूरी महज 50 किलोमीटर है, इसलिए कमांडर देवड़ा की टुकड़ी पकिस्तान की सीमा में बहुत अंदर तक चली गयी।

तभी उन्हें एक वायरलेस मैसेज से पता चला कि वे लाहौर के बहुत नजदीक आ गए है और चारो और से पाकिस्तानी सेना से घिर सकते है। यहाँ उनके पास भारतीय सीमा में लौटने का विकल्प था, लेकिन देवड़ा और उनकी टुकड़ी पर शायद अपने देश पर हमला करने वालो से बदला लेने का जूनून सवार था। देवड़ा ने हुंकार भरी और वे खुली जीप पर सवार हो गए।

उन्होंने अपने सैनिको से कहा- ‘यह जीवन -मरण का प्रश्न है। अब हमारे लिए करो या मरो के अलावा कोई रास्ता नहीं। ‘कमांडर की बात सुनकर सैनिको में जोश भर गया और उन्होंने लाहौर की और कूच कर दिया। टुकड़ी लाहौर से महज 6 मील दूर बर्फी पुलिस स्टेशन तक पहुंच गयी और वह भीषण लड़ाई लड़ते हुए पकिस्तान के 13 टैंको को नष्ट कर दिया। यहाँ उन्होंने पाक सैनिको से आत्मसमर्पण भी करवाया और फिर अपनी विजय का शंखनाद करते हुए लाहौर के बर्फी पुलिस स्टेशन पर भारतीय ध्वज तिरंगा फहरा दिया।

कमांडर देवड़ा को अदम्य साहस व वीरता के लिए पुरुस्कृत करते हुए ब्रिगेडियर बनाया गया। 1973 में राष्ट्रपति विवि गिरी ने अति विशिष्ट सेवा मेडल देकर उन्हें सम्मानित किया।