आज जब पूरी दुनिया रोहिंगना मुसलमानो के प्रति बड़ा प्रेम दिखा रही है और बौद्ध लोगो को आतंकवादी बता रही है उनको उनकी सहनशीलता का पाठ बता रही है।

लेकिन विश्व ने एक ऐसा समय भी देखा था, जब अफगानिस्तान में तालिबानी आतंकवादियों ने विश्व की सबसे उची बुद्ध प्रतिमा जैसी ऐतिहासिक धरोहरों को टैंक से छलनी कर दिया था। तब दुनिया देखती रह गयी और तालिबान ने शांति के प्रतिक गौतम बुद्ध की मूर्तियों को ध्वस्त कर दिया।

तालिबान के आतंकवादियों ने बुद्ध की प्राचीन मूर्तियों को तोड़ने का सिलसिला 1998 से शुरू किया जो 2001 तक चलता रहा। ये प्रतिमाये चौथी-पांचवी सदी में अफगानिस्तान स्थित बामियान की पहाड़ियों के पत्थरो को तराशकर बनायीं गयी थी। बलुआ पत्थर की इन मूर्तियों में विश्व में बुद्ध की सबसे उची मूर्ति शामिल थी।

मगर जब अफगानिस्तान में तालिबान का शासन आया तो उसके क्रूर कमांडर्स ने इन मूर्तियों को तोडना शुरू कर दिया। इसके लिए तालिबान ने अपने देश के पकडे गए शिया मुसलमानो को गुलाम बनाकर काम पर लगाया। सबसे पहले बुद्ध की मूर्तिओ पर सैकड़ो राउंड गोलियां दागी गयी। मगर वे प्रतिमा तो विशाल चट्टानों से बनी हुई थी,इसलिए गोलियां उन पर कुछ असर नहीं कर पायी। इससे और गुस्साए तालिबानी कमांडरों ने टैंक बुलवाये और प्रतिमाओं पर भारी गोलीबारी की।

बाकायदा प्रतिमाओं के चेहरे को निशाना बनाकर टैंको से गोले दागे गए। इससे मूर्तियों के चेहरे तो खंडित हो गए, लेकिन बाकी प्रतिमा जस की तस बनी रही। इससे मुर्ख तालिबानी कमांडर और बौखला गए। इस बार उन्होंने प्रतिमाओं के बचे हुए सिर के हिस्सों और शेष शरीर में गहरे सुराख़ करवाए गए और उनमे विस्फोटक भरे गए। यह सब उसी तरह किया गया, जैसा कि विशाल खदानों में से पत्थर निकालने के लिए किया जाता है। विस्फोटक भरकर उनमे धमाका किया और प्रतिमाओं को खंड-खंड कर दिया गया।

मूर्तियों को तोड़ने के दौरान भी तालिबानी कमांडरों ने क्रूरता की सारी हदे पार कर दी। गुलाम बनाये गए शिया मुसलमानो से जब वे विस्फोटक लगवाते, तब उनमे से कोई जरा भी कमजोर पड़ता तो उसे वही गोली मार दी जाती। फिर उसके शव को प्रतिमा में लगाए गए विस्फोटकों के पास बांध दिया जाता। जब धमाका होने पर मूर्ति और शव के चिथड़े उड़ते तो तालिबानी वह नजारा अन्य गुलामो को दिखाकर उनमे भय पैदा करते।

विश्व धरोहरों के साथ ये क्रूर मजाक होता रहा,लेकिन तब पूरी दुनिया बस देखती रह गयी और संयुक्त राष्ट्र तो मूक दर्शक बना रहा।