भूदान आंदोलन के प्रणेता व समाज सुधारक विनोबा भावे सादगी की प्रतिमूर्ति थे। उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसंग है, जिसमे एक दुर्दांत डाकू उनकी बातो से प्रभावित हो आत्मसमर्पण कर दिया।

विनोबाजी उन दिनों चम्बल में प्रवास कर रहे थे। उस समय चम्बल का एक डाकू था लच्छी, जिसने उन दिनों पुलिस के बचकर बम्बई में डेरा डाल रखा था। वह विनोबाजी के कार्यो से प्रभावित था और जब उनके चम्बल में होने का पता चला तो भेष बदलकर उनसे मिलने आया।

हालाँकि विनोबाजी से साक्षात् मिलने पर वह झूठ नहीं बोल पाया और अपनी असलियत उनके सामने जाहिर कर दी। विनोबा ने उससे पूछा-” तुम बम्बई में छिपे रहते हो पुलिस तुम्हे पकड़ नहीं पाती ?” लच्छी बोला-“लाखो की भीड़ में किसी एक को पकड़ पाना आसान नहीं है बाबा ! एक बार पुलिस मेरे धोखे में किसी और को पकड़ लायी थी, पर असलियत सामने आने पर उसे छोड़ना पड़ा। ”
तब विनोबा जी ने उसे समझाया -“जो तुम कर रहे हो, वह गलत काम है। उसे छोड़ो ,अपनी गलती स्वीकारो। इससे आगे का जीवन सुधरेगा। अब तक का जीवन गया सो गया, आगे के लिए सावधान हो जाओ। ” उनकी वाणी का ऐसा असर हुआ कि लच्छी डाकू तुरत आत्मसमर्पण के लिए तैयार हो गया।