‘शिव’ सनातन धर्म में परम् सत्ता को कहा गया है। वह सत्ता जिससे सब संचालित होता है, जो कण-कण में विद्यमान है, जीवों में स्वांस एवं अजीवों में ऊर्जा का प्रवाह…सबकुछ इसी सत्ता से संचालित है। आसान शब्दों में कहूँ तो ‘होना’ ही ‘शिव’ है, ‘अस्तित्व’ ही ‘शिव’ है, ‘शिव’ से अलग कुछ कल्पना भी नहीं की जा सकती।

हिन्दू धर्म जहाँ एक ओर आध्यात्म पर बल देता रहा है वही दूसरी ओर विज्ञान में भी विशेष आयाम स्थापित किये हैं हमने। अतः हमने ‘शिव’ को मूर्त रूप दिया, जिसे ‘शिवलिंग’ कहते हैं। ‘शिवलिंग’ सिर्फ कोरी कल्पना या आस्था का विषय न होकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है परन्तु समय चक्र के फेर में ‘शिवलिंग’ से जुड़ा विज्ञान बहुत पीछे छूट गया और रह गयी सिर्फ उसकी पूजा, ऐसी पूजा जिसका कोई ठोस आधार आज हमारे पास नहीं है, भूल गए हम उस विज्ञान को जो हमारे पूर्वजों ने, ऋषि-मुनियों ने सदियों की तपस्या के फलस्वरूप प्राप्त किया था। शायद हमारे पूर्वजों को पूर्वानुमान था कि हम उस विज्ञान को सहेजने में असमर्थ होंगे अतः उन्होंने परम् सत्ता, ईश्वर, परमात्मा, शिव का ऐसा सरलतम स्वरूप(मानवीय रूप) हमें दिया जिसे हम न सिर्फ आसानी से समझ सकें बल्कि उस परम् शक्ति का अनुसरण भी कर सकें…मैं बात कर रहा हूँ भोलेनाथ की, हाँ वे ही भोलेनाथ जिनकी लंबी-लम्बी जटाएं, गले में नाग, सिर पर गंगा, देह पर भस्म और परमप्रिय नन्दी जिनकी पहचान हैं। ‘शिव’ आराधना की कई विधियां प्रचलित हैं और शिव भक्तों ने अपनी सुविधानुसार इन विधियों को अपनाया है, ‘भोलेनाथ’ तो भोले हैं जल, बेलपत्र, धतूरा, भांग इन्हें बड़े प्रिय हैं, ये सारे साधन सामान्य मनुष्य की सामर्थ्य में उपयुक्त हैं।

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‘सावन मास’ का ‘शिवभक्ति’ की दृष्टि से विशेष महत्व है, ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में ‘शिव’ सबसे अधिक प्रसन्नचित होते हैं और अपने भक्तों की मनोकामना अवश्य पूर्ण करते हैं। ‘शिव’ की प्रसन्नता प्रकृति में भी महसूस की जा सकती है…चारों तरफ हरियाली, नई कोपलें फूट रही हैं, सतरंगी फूल खिले हैं…आप यदि प्रकृति से थोड़ा भी मेल-जोल बनाये तो यह महीना आपके मस्तिष्क, ह्रदय और चेतना को नई ऊर्जा से भर देगा।

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महादेव,भोलेनाथ,शंकर,मृत्युंजय,नीलकण्ठ,आदियोगी…कई नाम हैं इनके और हर नाम में जीवन की सार्थकता और निरर्थकता,द्वेत एवं अद्वेत का सामंजस्य। एक ओर जहाँ शिखर पर चन्द्र सुशोभित है तो वही दूसरी ओर विषधर से प्रगाढ़ प्रेम…जटाओं में सौम्य गंगा तो देह पर श्मशान की भस्म…एक शिव वे जिन्हें आदियोगी कहा जाता है, हमेशा ध्यान में लीन और दूसरे शिव वे जो भूत-पिशाचों के साथ अल्हड़पन में सारी सुध बिसराकर नाचने लगते हैं, कभी अत्यधिक क्रोध से भरकर रौद्र रूप धारण कर लेते हैं तो कभी अपने भक्तों के लिए भोले बन जाते हैं…परिवार भी बड़ा अनूठा जिसमें ‘भोलेनाथ’ हैं अघोरी और जंगल में वास करने वाले और ‘माँ गौरी’ एक राजकुमारी…’गणपति’ हैं बुद्धि के देवता तो वहीं ‘कार्तिकेय’ पराक्रमी एवं शौर्यशाली… ‘मूषक’-‘सर्प’-‘मयूर’ ‘नन्दी’-‘सिंह’…आहार श्रंखला में सामंजस्य को दर्शाता है।

‘शिव’ योगी हैं तो वहीं एक ओर दाम्पत्य जीवन में भोगी भी हैं, ‘शिव’ ने कुछ भी त्यागा नहीं, जो भी गुण-अवगुण, अच्छाई-बुराई, योग-भोग को उसकी सम्पूर्णता में समाहित कर लिया है और करें भी क्यों न आखिर वे ‘शिव’ हैं…अस्तित्व।

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