नरेंद्र मोदी जबसे प्रधानमंत्री बने है, उन्होंने बड़े से बड़े वैश्विक मंच से हिंदी में ही अपनी बात कही है। इससे हिंदी वैश्विक स्तर पर फिर चर्चा में है। अब तो विदेशी नेता भी मोदी से मुलाक़ात पर शुरुवाती शब्द हिंदी में बोलने या हिंदी में ही ट्वीट करने की कोशिश करते है।

देश को नेतृवत देने वालो में हिंदी के प्रति यह प्रेम आज से नहीं बल्कि आज़ादी के बाद से है। एक राष्ट्रपति तो ऐसे भी हुए है, जिन्हे बचपन से हिंदी लिखने के लिए देवनागरी लिपि सीखने का इतना जूनून था कि वे रात रातभर इसे लिखते। हालात ये हो गए थे कि उनकी अंगुलियों के पोरो से खून निकलने लगा था, फिर भी हिंदी सीखने के प्रति उनका जूनून कम नहीं हुआ।

यह किस्सा देश के ७ वे राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह का है। वे मूलतः पंजाबी थे इसलिए बचपन से अपने माता-पिता की भाषा पंजाबी ही सिखी। वे लिखने के लिए भी गुरुमुखी सीख पाए क्युकी उनके बचपन के दौर में उनके इर्द-गिर्द यही भाषा यही लिपि थी। मगर एक बार उन्होंने उनके गांव आये एक संत को संस्कृत में श्लोक उच्चारण करते और हिंदी में उसका अर्थ समझाते सुना तो दंग रह गए। उन्हें लगा कि संस्कृत एक श्लोक न पढ़े तो फिर जीवन में क्या किया। उन्होंने तय किया कि वे संस्कृत भी सीखेंगे और हिंदी भी ,ताकि श्लोको का हिंदी में लिख अनुवाद भी समझ सके।

अपनी संस्कृति की महानता को समझने का जूनून उनमे ऐसा छाया कि वे माता पिता की अनुमति लेकर उन संत के पास चले गए और अनुनय किया कि वे उन्हें अपना शिष्य स्वीकार कर संस्कृत व् हिंदी सीखा दे। संत का वहा कोई स्थाई डेरा नहीं था, वे तो देशभर में भ्रमण करते रहते थे। इसलिए उन्होंने कहा ‘ जब तक यहाँ हु, तुम्हे सिखाता रहूँगा। लेकिन इसके लिए रोज ब्रह्ममुहूर्त में उठकर आना होगा।’

जरनैलसिंह (बचपन का नाम) रोज ब्रह्म मुहूर्त में उठकर संत के पास जाते और देवनागरी लिपि लिखना सीखते। उस ज़माने में लिखने के लिए लकड़ी के बड़े पटिये होते थे। वे उसी पर पूरा-पूरा दिन और रात में भी अभ्यास करते। इससे उनकी अंगुलियां छील गयी और पोरो से रक्त बहने लगा। फिर भी वे रुके नहीं और संस्कृत के श्लोक व् हिंदी में उनका अर्थ लिखते रहे। बाद में इसी जूनून ने उन्हें देश का राष्ट्रपति पद तक पहुंचाया |