देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की छवि एक धर्मनिरपेक्ष राजनेता की रही। और काफी हद तक इस छवि ने ही उनके प्रधानमंत्री बनने का रास्ता भी तैयार किया था। मगर कुछ घटनाएं बताती है कि नेहरू जरुरत पड़ने पर धर्मनिरपेक्षता बनाए रखने के लिए जोखिम नहीं उठाते थे। उल्टे वे धर्म संबंधी विवादों या पेचीदा स्तिथियों को सुलझाने के प्रयत्न करने के बजाय पीछे हट जाते थे।

बात आजादी के पहले 1920 से लेकर 1929 के बीच की है। इस दौरान देश के हिन्दुओ और मुसलमानों में खूब विवाद होते थे। विवाद का कारण मस्जिदों में पढ़ी जाने वाली नमाज और मंदिरो में होने वाली सुबह व शाम की आरती का एक साथ होना था। आरती की घंटियों की आवाज से मुस्लिम नाराज होते जबकि अजान की आवाज से हिन्दुओ में नाराजगी रहती। उस दौर में कांग्रेस ऐसी पार्टी के रूप में थी, जिसे देश की जनता का प्रतिनिधि माना जाता था।

ऐसे में इन झगड़ो को सुलझाने का जिम्मा कांग्रेस पर था। नेहरू उन दिनों में कांग्रेस के प्रधानमंत्री थे। इस हैसियत से उन्हें इस मामले में निर्णायक भूमिका निभानी थी। यूं भी नेहरू को धर्मनिरपेक्ष माना जाता था और वे खुद भी अपने व्यवहार से यह जताने का प्रत्यन करते थे कि वे धार्मिक न होकर धर्मो से परे हैं।

मगर जब हिन्दू-मुस्लिम झगड़ो को सुलझाने की बात आई तो नेहरू ने कदम पीछे हटा लिए। उन्होंने खुद अपनी आत्मकथा में लिखा है “सबकुछ सुलझा पाना मुश्किल था और मेरी इसमें ज्यादा रूचि नहीं थी। “अंततः हुआ यह कि झगड़े सुलझाने के बजाय बढ़ते गए और हिन्दू-मुस्लिम के बीच की खाई बढ़ती चली गयी।