ये जो बॉलिवुड के नाचनेवाले वाले और गानेवाले भांड होते हैं ना, जो हिन्दी मे बात करना अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं उन्हें सब कुछ अपनी सुविधा और स्वाद के हिसाब से चाहिये, चाहे वो परंपरा हो या संस्कृति। यहाँ तक कि धार्मिक संस्कृति के नियमों मे से भी वो वही नियम चुनते हैं जो उनकी भौतिकवादी ज़रूरतों को पूरा करता है, बाक़ी नियमों का अपनी सुविधा से मज़ाक़ उड़ाते हुऐ उसे कचड़े के डब्बे में फेंक देते हैं।

बॉलिवुड की भूतपूर्व हेरोईन पूजा बेदी जी, जो आजकल राष्ट्रीय दैनिक मे लिखती है, कहती हैं उन्होंने अपनी दिल्ली वाली आंटी की मौत को अलग तरह से सेलिब्रेट किया, मतलब आंटी की मौत पर दुख तो हुआ लेकिन शोक नहीं मनाया। आंटी मतलब चाची, मामी या मौसी कोई भी हो सकती है। जिस दिन पुजा बेदी जी की आंटी गुज़र गई उस दिन उनके पूरे परिवार ने चिकन बिरयानी और मटन करी, मतलब मुर्गी की बिरयानी और बकरे के माँस की करी, जम कर खाया क्योंकि मृतक को शाकाहारी भोजन बिल्कुल पसंद नहीं था। पूजा बेदी जी के हिसाब से, जब मृतक के परिवार ने चिकन बिरयानी और मटन करी को स्वाद ले लेकर खाया तो मृतक की आत्मा को तृप्ति मिल गई।

शमशान घाट पर जब पंडित जी ने मृतक के गोत्र का नाम पुछा तो सबके सर चकरा गये, हड़बड़ी मे सबने रिश्तेदारों को फ़ोन भी किया, लेकिन अंत तक भी मृतक के परिवार के किसी भी सदस्य को परिवार के गोत्र का नाम नही पता चला। पूजा बेदी जी कहती हैं, “गोत्र के नाम जानने मे कोई तर्क ही नहीं है, मृतक अपने देह का त्याग कर चुकी है, गोत्र का नाम वीज़ा या पासपोर्ट नहीं होता जिसकी वजह से उनको स्वर्ग मे प्रवेश मिल जाऐगा, भगवान को तो पता ही है कि मरनेवाला कौन है।

पूजा बेदी जी, अगर पंडित जी को मृतक के गोत्र बताने से मृतक को स्वर्ग मे प्रवेश नहीं मिल सकता तो मृतक के परिवार ने उनकी मौत के बाद जो मुर्गी की बिरयानी और बकरे के माँस की करी का जमकर भोज किया, उससे मृतक की आत्मा को कैसे तृप्ति मिल सकती है? मृतक तो अपने देह का त्याग कर चुकी है फिर उनके परिवार के मुर्गी की बिरयानी और बकरे के माँस की करी का स्वाद ले लेकर खाने से आपकी आंटी की आत्मा कैसे तृप्त हो सकती है? जब आपका परिवार गोत्र मे विश्वास ही नहीं करता तो आप लोगों ने पंडित जी को क्यों बुलाया? हिंदु धर्म के धार्मिक संस्कारों का मज़ाक़ उड़ाने के लिये? मरने के बाद का सारा क्रिया कर्म अपने किसी स्टाफ़ या नौकरों से करवा लेते। पंडित जी को बुलाने का ढोंग क्यों रचाया?

पूजा बेदी जी, आज आपने पाखंड (hypocrisy) और अवसरवाद (opportunist) को नये सिरे परिभाषित किया: शमशान घाट पर पंडित जी को मृतक का गोत्र बताने से मृतक को स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता, क्योंकि मृतक अपना देह त्याग चुकी है। परंतु मृतक की मौत के बाद जब उसका परिवार जमकर चिकन बिरयानी और मटन करी के स्वाद का आनंद उठाऐ तो उससे मृतक की आत्मा तृप्त हो जाती है, क्योंकि जब मृतक का परिवार मुर्गी की टाँगो और बकरी के माँस का स्वाद ले रहा था तब ये भूल गया कि मृतक अपने देह का त्याग कर चुकी है, उसका परिवार मासूम जानवरों को मारकर खाऐ या कंदमूल खाऐ उससे मृतक की आत्मा को कोई फ़र्क़ नही पड़ता है।