संसद के संयुक्त सत्र के संबोधन में राष्ट्रपति की ओर से लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने की पैरवी से यह साफ़ हो जाता है कि सरकार इसको लेकर गंभीर है। चूँकि राष्ट्रपति का अभिभाषण सरकार का नीतिगत दस्तावेज होता है, इसलिए उसमे एक साथ चुनाव का विचार शामिल होना और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस विचार पर विपक्षी दलों की जो भी राय हो, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है कि पहले आम चुनाव के बाद से लम्बे समय तक लोकसभा और विधानसभाओ के चुनाव एक साथ ही होते रहे। बाद में सरकारों के कार्यकाल पूरा करने से पहले ही गिर जाने और मध्यावधि चुनाव की नौबत आने के कारण एक संविधानसम्मत स्वस्थ परंपरा बाधित हो गई।

इसके स्थान पर लोकसभा और विधानसभाओ के चुनाव अलग अलग होने की परंपरा ने जड़े जमा ली। इससे विचित्र और कुछ नहीं कि यह जानते हुए भी इस बदली हुई परंपरा को उपयुक्त बताया जाए कि बार बार होने वाले चुनाव की लय को बाधित करने के साथ ही आर्थिक तौर पर देश के लिए बोझ साबित होते है।

बेहतर है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में एक साथ चुनाव की चर्चा होने के बाद सभी राजनितिक दल इस पर गंभीरता से चिंतन करे कि नेक विचार को फिर से अमल में कैसे लाया जा सकता है। निःसंदेह इसके लिए संविधान में उपयुक्त संशोधन करने होंगे, लेकिन यह कठिन कार्य नहीं है। ऐसे नियम कानून आसानी से बनाये जा सकते है, जिससे कभी केंद्र या राज्य सरकार के अल्पमत में आ जाने की स्थिति में बिना मध्यावधि चुनाव नई सरकार का गठन हो सके।

ध्यान रहे, कई देशो ने ऐसे उपाय कर रखे है कि सरकार के अल्पमत में आने के बाद भी मध्यावधि चुनाव से बचा जा सके। आखिर भारत ही ऐसा क्यों नहीं कर सकता?

बार बार चुनाव के सिलसिले को रोकना केवल राजनितिक तंत्र में सुधार को ही बल नहीं देगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी मददगार बनेगा। इससे आर्थिक संस्थानों के साथ साथ मानव संसाधन पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ से बचने के साथ ही विकास को गति देने में भी सहूलियत होगी।

हमारे राजनितिक दल इससे अनजान नहीं हो सकते कि बार बार चुनाव होने से आचार संहिता किस तरह विकास के कार्य को बाधित करती है। वे इससे भी भली तरह अवगत होंगे कि चुनावों की घोषणा होते ही किस तरह सभी दलों की भाव भंगिमा बदल जाती है। इसके कारण राजनितिक परिदृश्य के साथ साथ सामाजिक माहौल भी प्रभावित होता है।

चूँकि चुनावी मुद्दों के आगे सभी मसले नेपथ्य में चले जाते है, इसलिए अन्य अनेक आवश्यक कार्य भी प्रभावित होते है। यह आदर्श स्थिति नहीं हो सकती कि ऐसा औसतन वर्ष में दो तीन बार हो।

यदि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ करने पर सहमति बनती है तो इससे जनता को तो कोई परेशानी नहीं होने वाली, लेकिन कुछ विपक्षी दल उसकी आड़ जरूर ले सकते है। उन्हें ऐसा करने से बचना चाहिए और जनहित के साथ राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। आखिर किसी भी राजनितिक दल का हित राष्ट्रहित से इतर तो नहीं हो सकता