15 अगस्त 1947 को जब भारत को आजादी तो मिली, लेकिन तब भी पूरा देश आजाद नहीं हुआ था। अंग्रेज तो चले गए थे लेकिन दुर्भाग्य से देश के कई हिस्सों में पुर्तगाली और फ़्रांसिसी आक्रांता अब भी कब्ज़ा जमाए बैठे थे। आश्चर्य यह कि इन विदेशी ताकतों के खिलाफ आजाद भारत की सरकार ने कुछ नहीं किया।

उल्टे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस बात की बाट जोहते रहे कि ‘मेहमान हैं, खुद ही चले जाएंगे। इनके खिलाफ विद्रोह करने से विश्व बिरादरी में अच्छा संकेत नहीं जाएगा। ‘ आश्चर्य कि नेहरू यह सोचकर ‘सयंम’ से काम लेते रहे कि मामला आपसी बातचीत से सुलझ जाएगा।

मगर नेहरू से अलग सोच रखने वाले सोशलिस्ट आंदोलनकारियों ने गोवा को मुक्त करवाने और पुर्तगालियों को भगाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। जुलाई 1954 में मुंबई के कुछ आंदोलनकारियों ने एक छोटे से भूभाग दादरा पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद आंदोलन को और तेज करते हुए उससे कुछ बड़े भूभाग नागर-हवेली पर भी बिना किसी हिंसक लड़ाई के कब्ज़ा कर लिया। इससे आंदोलनकारियों का हौसला बढ़ा और स्वतंत्रता दिन अर्थात 15 अगस्त 1954 को एक हजार से ज्यादा स्वयंसेवको ने गोवा की मुक्ति के लिए आंदोलन शुरू कर दिया।

मगर आश्चर्य कि उन्हें पुर्तगालियों द्वारा रोके जाने के बजाय भारतीय पुलिस ने ही रोक लिया। इसका अंदरूनी कारण यह था कि ‘नेहरू किसी तरह का बिगाड़ नहीं चाहते थे और वे यह मान बैठे थे कि सबकुछ आपसी सहमति से सुलझ जाएगा। ‘ मगर आपसी सहमति से कुछ होना जाना नहीं था। यदि होना होता तो अंग्रेजो की तरह पुर्तगाली भी भारत छोड़कर चले गए होते।

अंततः जब भारत के पक्ष में आंदोलन कर रहे भारतीय लोगो को भारत की ही पुलिस ने बलपूर्वक रोका तो आंदोलनकारी उखड गए। अंततः एक साल बाद आंदोलन हिंसक हुआ, मगर तब भी हजारो भारतीय जेल में ठूंसे दिए गए। फिर आंदोलन बढ़ता गया और आखिरकार पुर्तगालियों को भारत छोड़ना पड़ा।