बहुत कम लोग ऐसे होते है जिनमे “ना” कहने का साहस होता है। और यदि यह “मनाही” सीधे प्रधानमंत्री के सामने करनी हो तो स्थिति और जटिल हो जाती है। मगर भारत में ऐसे साहसी वैज्ञानिक भी हुए, जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के सामने साफ़ साफ़ कह दिया था -“देखिये इंदिराजी, यदि परमाणु परीक्षण सम्बन्धी प्रक्रिया एक बार शुरू हो गयी तो फिर हम आपकी भी नहीं सुनेंगे। ” ये साहसी वैज्ञानिक थे होमी नौशेरवानजी सेठना।

सेठना भारत की आज़ादी के पहले मिशिगन यूनिवर्सिटी में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे थे।  जब भारत आज़ाद हुआ और महान वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा ने भारत की परमाणु शक्ति संपन्न देश बनाने का सपना देखा तो उन्होंने दुनियाभर में फैले भारतीय वैज्ञानिको से अपने देश लौटने और देश के विकास में योगदान देने का आह्वान किया।

उनकी इस अपील पर कई वैज्ञानिक भारत लौट आये, जिनमे सेठना का नाम सबसे प्रमुख था।  सेठना अद्भुत वैज्ञानिक प्रतिभा के धनी थे और परमाणु सम्बन्धी मामलो के जानकार भी। भारत लौटते ही उन्होंने होमी जहांगीर भाभा के साथ मिलकर परमाणु कार्यक्रम पर काम करना शुरू कर दिया।

दुर्भाय से इसी बीच विमान दुर्घटना में भाभा जी की मृत्यु हो गयी और भारत के परमाणु कार्यक्रम को बड़ा झटका लगा। मगर सेठना ने स्थिति को संभाला और अंतः 1974 में देश को अपने पहले परमाणु परीक्षण की स्थिति में ले आये। प्रधानमंत्री होने के नाते तब इंदिरा गाँधी ने परमाणु परीक्षण आदेश दे दिए।

तब नौरावंशी सेठना ने चेतावनी भरे लहजे में साफ़-साफ़ कहा-‘ध्यान रखिये इंदिरा जी आप ‘हा’ कह रही है। इस हां का मतलब सम्पूर्ण सहमति है। बाद में यदि किसी दबाव में आप इस प्रक्रिया को रोकने के लिए कहेंगी, तब भी हम रोकेंगे नहीं। फिर भले ही सर्वस्व दांव पर लग जाये, लेकिन हम आपकी भी नहीं सुन पाएंगे।

सेठना जी इस स्पष्ट अंदाज ने कुछ पल के लिए इंदिरा गाँधी को भी असहज कर दिया। हालाँकि फिर वे संभलकर बोली- हां, मेरी पूर्ण सहमति है।