भारत ने फिर विदेश निति में दृढ़ता दर्शाई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले महीने अपनी अफगानिस्तान नीति का ऐलान करते हुए भारत से उस युद्ध जर्जर देश में ज्यादा बड़ी भूमिका निभाने की अपील की थी।

तब ट्रंप ने अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिको की संख्या बढ़ाने का इरादा जताया था। जाहिर है ट्रंप की इच्छा है कि अफगानिस्तान में आतंकवादियों से लड़ाई का कुछ बोझ भारत भी उठाये। जबकि भारत की यह सुविचारित नीति है कि विदेशो में वह अपनी सेना शांति रक्षण कार्यो के लिए भेजता है। किसी तीसरे देश में जाकर युद्ध में शामिल होना भारत की नीति नहीं है।

यही बात रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने नई दिल्ली आये अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस से दो टूक कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत अफगानिस्तान में विकास सम्बन्धी मदद तथा मेडिकल सुविधाएं मुहैया करना जारी रहेगा, लेकिन फौजियों को वहा नहीं भेजा जायेगा।

इधर मैटिस ने परोक्ष रूप से वो पैगाम भारत को देने की कोशिश की, जो ट्रंप का मंतव्य है। कहा – ‘आतंकियों को कही भी सुरक्षित पनाहगाह मुहैया नहीं कराई जा सकती। विश्व नेता के रूप में भारत व अमेरिका को मिलकर इसके खात्मे के लिए काम करना चाहिए’।

बेशक आतंकवादियों के अड्डे को खत्म करना भारत का भी मकसद है। लेकिन इसके लिए वह ऐसी रणनीति नहीं अपना सकता, जिसके लाभ स्पष्ट ना हो। अफगानिस्तान में अमेरिकी फ़ौज 16 साल से मौजूद है। मगर वह तालिबान और दूसरे दहशतगर्दो का सफाया ना कर सकी। बराक ओबामा के कार्यकाल में ज्यादातर सैनिक लौटा लिए गए।

अब ट्रंप में ओबामा की नीति पलट दी है। लेकिन वे चाहते है की दूसरे देश भी इसमें शामिल हो। स्वाभाविक है कि भारत ऐसे फैसले अपने लाभ हानि का आकलन करते हुए करेगा। मगर भारत अमेरिका से अपने रणनीतिक संबंधो की कीमत समझता है। इसी का परिणाम है कि सीतारमन और मैटिस ने समुद्री सहयोग बढ़ाने पर सहज सहमति बनी।

चीन से दोनों देशो को खतरा बढ़ रहा है। चीनी नौसेना दक्षिण चीन सागर में मनमानी करने पर आमादा है। इस पृष्ठभूमि में उपरोक्त सहमति महत्वपूर्ण है। चीन किस हद तक भारतीय भावनाओ को आहत करता है, इसकी एक मिसाल संयुक्त राष्ट्र में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के भाषण पर उसकी प्रतिक्रिया भी है।

वहां के एक सरकारी अखबार ने स्वराज के भाषण को असहिष्णुता करार दिया। ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने अपने संपादकीय में माना कि पकिस्तान में आतंकवाद है, फिर भी वो पाकिस्तान के बचाव में खड़ा हुआ है। सवाल उठाया कि जान बूझकर दहशतगर्दी को बढ़ावा देने से आखिर पाकिस्तान को क्या फायदा होगा? जिस समय चीन ऐसी चाल रहा है, राहत की बात है कि भारत अमेरिका सहयोग प्रगाढ़ हो रहा है। और यह भी संतोष का पहलू है कि भारत अपनी स्वतंत्र एवं सुदृढ विदेश नीति से कोई समझौता किये बगैर अमरीका से ऐसे संबंध बना रहा है, जो इसके हित में है।