गांधी महान कैसे हो गए? बड़ा ही विचित्र सवाल था| बचपन से ही स्कूल में पढ़ लिया “महात्मा गांधी”|

“दे दी हमें आजादी बिना खडक बिना ढाल साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल”

यह गाना सुन रहा हूं बचपन से| 1947 में आजाद हुए भारत के पीछे सबसे बड़ा श्रेय मोहनदास गांधी को जाता है| जी हां सही बात है गांधी ने देश म आजादी के लिए आंदोलन किया था|

तो फिर 1947 में देश के बटवारे का श्रेय में किसको दूं? आजादी के दौरान हुए बटवारे के दंगों पर मरे हुए लाखों हिंदुओं की कत्ल का श्रेय किसको दूं? लाखों महिलाओं के लुटे हुए आबरु का श्रेय किसको दूं? भगत सिंह राजगुरु सुखदेव और सुभाष चंद्र बोस जैसे हमारे आदर्शो के कत्ल का श्रेय किसको दूं?

जब भी यह सवाल मेरे मन में उठते हैं ,तो यह कहने का मन करता है कि आख़िर गांधी महान कैसे हुए? “वह( मुस्लिम) तुम्हारे जिस्म बेआबरू कर सकते हैं मन को नहीं, उसे शांति से स्वीकार लो”: आदरणीय बापू का बयान दंगों में बलात्कार का शिकार हुई हिंदू महिलाओं के लिए|

जी हां यह हमारे आदरणीय बापू का सोच विचार है, वह भी उस भारत भूमि में जहां रामायण और महाभारत जैसे उदाहरण मौजूद हैं जिसमें महिलाओं के आबरु की रक्षा के लिए हमारे भगवान शस्त्र उठाने की सीख देते हैं|

1920 और 1921 में हुए मोपला दंगों में मारे गए 5000 से ज्यादा हिंदुओं के चिताओं पर हमारे आदरणीय बापू मौन रहे|

भगत सिंह ,राजगुरु, सुखदेव, सुभाष चंद्र बोस और हमारे अन्य क्रांतिकारी आदर्श वाले पुरुष गांधी के दोगले अहिंसावादी विचारों की भेंट चढ़ गए|

जी हां यह हमारे वही आदर्शवादी गांधी हैं जिन्होंने अहिंसा के जरिए स्वतंत्रता को पाना पाप समझा|

परंतु द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने भारतीय युवाओं को अंग्रेजों की मदद करने की अपील की| प्रिय बापू क्या द्वितीय विश्वयुद्ध कोई अहिंसावादी आंदोलन था? अपने राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए अगर हथियार भी उठाना रहे या प्राण भी निछावर करने रहे तो उसके लिए तैयार रहना चाहिए| यह बातें हमारे गीता और अन्य पुराणों में लिखी गई है|

परंतु किसी व्यक्ति ने दो गाल पर तमाचा खाकर सब कुछ सहन करना सिखा दिया और हम हिंदू मूर्खों की तरह हमारे भगवान को भूल कर किसी दूसरे दोगले व्यक्ति को महान बना बैठे| हिंदुओं पर मुस्लिमों द्वारा किए गए कई अत्याचार और कत्ल पर चुप्पी साधने वाले यह आपके बापू मुस्लिम तुष्टिकरण के सर्वप्रथम नेता हैं|

अभिमान से घास का रोटी खाने वाले महाराणा प्रताप की संताने, और पराक्रमी छत्रपति शिवाजी महाराज की संतानों ने दो गाल पर तमाचा खाना सीख लिया और अहिंसा वाद के ढोंग को अपना लिया| और देश के टुकड़े होते हुए हम नपुंसक की तरह देखते रह गए और गांधी जयंती मनाते रह गए|

आज भी वही अहिंसावाद का ढोंग हमारे रगों में दौड़ रहा है| न जाने कितने कारगिल, केरल, कश्मीर और बंगाल देखने के बावजूद भी हम दो गाल पर तमाचा खाना नहीं भूले|

अंत में आप सभी से एक सवाल पूछूंगा क्या व्यक्ति की महानता इतनी बड़ी है की राष्ट्रीय एकता और अखंडता उसके सामने छोटा पड़ जाता है? यदि हां तो इसी आदर्शों पर चलते रहिए और राष्ट्र के टुकड़े होते देखते रहिए|

शायद आपके आदर्श बापू होंगे हमारे लिए आज भी भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस ही देश के नायकों में से एक हैं| क्योंकि चरखा चलाने से या सूत काटने से ,नहीं आजादी के लिए गर्दन कटा नहीं पड़ी है| हर बड़ी वारदातों को भूल लेना और मौन होकर देखते रहना हमारी आदत है, एक कवि की पंक्तियां मुझे याद आती है

“देखते ही देखते गवाया गया बंदू, वक्त हाथ आने पर अपनाया भी गया नहीं, सवा लाख शत्रुओं के शस्त्र डालने के बाद भी बमकिन धरा को अपनाया भी गया नहीं|

दाहिर नरेश की वसुंधरा कराची में झंडा यह तिरंगा लहराया अभी गया नहीं, रोज राष्ट्रगान में सिखाया गया सिंध लेकिन, हिंदी मां के चित्र में दिखाएं अभी गया नहीं|”

सोते रहिए और और गाल पर तमाचा खा लीजिए ,राष्ट्र जाए भाड़ में