मशहूर शायर निदा फाजली का एक शेर है…….

‘हर आदमी में होते है दस-बीस आदमी

जिसको भी देखना हो, कई बार देखना’!

कुछ मायनो में यह शेर पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के व्यक्तित्व पर भी सटीक लगता है। दरअसल, शास्त्री जी त्याग की प्रतिमूर्ति, सरल-सहज व्यक्तित्व के धनी, मृदभाषी और जमीन से जुड़े हुए नेता रहे। देशवासियो के हृदय में उनकी छवि एक ईमानदार, संवेदनशील और सादगीपसंद नेता की ही बनी।

मगर उनके व्यक्तित्व के कुछ पहलू ऐसे भी थे, जो कभी सामने आये ही नहीं। मसलन, एक बार उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के मुद्दे पर खुलकर कहा था- “मै उतना साधु संत आदमी नहीं हू भाई! कौन है जो प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहेगा। स्थितियां अनुकूल रही तो मै जरूर प्रधानमंत्री बनूँगा।”

प्रधानमत्री बनने की उनकी ये चाह तब सामने आयी थी, जब देश में प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू बीमार और कमजोर हो चले थे। तब राजनीती के गलियारों में यह प्रश्न उठने लगा था कि ‘नेहरू के बाद कौन? ‘कई लोग स्वाभाविक रूप से नेहरू की बेटी इंदिरा गाँधी को उनकी उत्तराधिकारी मानते हुए कहते थे कि ‘प्रधानमंत्री तो इंदिरा जी ही बनेंगी। ‘ जबकि इंदिरा तब छोटी और अपरिपक्व थी।

ऐसे में नेहरू के बाद शास्त्री जी सबसे वरिष्ठ व स्वाभाविक उत्तराधिकारी थे। इंदिरा और शास्त्रीजी के नाम की इस कश्मकश पर सवाल पूछे जाने पर शास्त्री जी ने दबी हुई भावनाओ का इजहार किया था कि ‘वे प्रधानमंत्री बनना चाहते है।’ उन्हें जानने वाले तब हैरत में पड़ गए थे, क्योंकि तब लगता नहीं था शास्त्रीजी के व्यक्तित्व में महत्वाकांक्षा भी होगी।

हालाँकि बाद में शास्त्रीजी ने स्पष्ट किया था कि ‘उन्होंने देशहित में कहा था, अपनी महत्वाकांक्षा के लिए नहीं’।