बाढ़ और सूखे की खबरों से परेशान रहे देशवासियो के लिए यह खबर निश्चित ही राहतकारी होनी चाहिए कि नरेंद्र मोदी सरकार ने नदियों को जोड़ने की परियोजना पर आगे बढ़ने का मन बना लिया है। गौरतलब है कि इस परियोजना की रुपरेखा अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए-1 सरकार के दौरान बानी थी।

वर्ष 2002 में नदी जोड़ने परियोजना की व्यावहारिक सम्भावना की पड़ताल के लिए कार्यदल भी बना था। लेकिन इसके पहले कि बात अंजाम तक पहुंच पाती, केंद्र में सरकार बदल गयी। 2004 में सत्ता में आयी यूपीए सरकार ने इस योजना को ठन्डे बस्ते में डाल दिया। लेकिन अब खबर है कि इस परियोजना को हरी झंडी मिल गयी है।

समझ यह है कि जब नदियों में पानी बढ़ता है, तो उसका भंडारण किया जाए और फिर उसे उस इलाके में पहुंचाया जाए, जहां लोग जल संकट झेल रहे होते है। इस क्रम में नहरों का जाल बिछेगा, जिससे उन इलाको में भी सिंचाई हो सकेगी, जहां मानसून ठीक ना रहने के कारण खेती प्रभावित होती है।

इस योजना पर अमल के क्रम में हजारो लोगो को रोजगार भी मिलेगा। तो कुल मिलाकर यह प्रकृति और मानव प्रयास के मेल से देश को समृद्ध बनाने का ऐसा सपना है, जिसे साकार करने में अब और देर नहीं होनी चाहिए।

स्पष्टतः केंद्र सरकार इस तकाजे से अवगत है। संभावना है कि नदी जोड़ो परियोजना पर काम जल्द शुरू हो जायेगा। इस पर लगभग 87 अरब डॉलर का खर्च आएगा। इसके तहत तक़रीबन 60 नदियों को जोड़ा जायेगा। शुरुवात केन और बेतवा नदियों को जोड़ने से होगी। ये दोनों नदियां उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से से गुजरती है।

इन्हे जोड़ने के लिए 22 किलोमीटर लम्बी नहर बनेगी। गंगा, गोदावरी, और महानदी जैसी ज्यादा पानी वाली नदियों को भी कई दूसरी नदियों से जोड़ने की योजना है। इसके लिए इस नदियों पर बाँध बनाए जायेंगे। उनसे इकट्ठे पानी को नहरों के जरिए दूसरी नदियों तक पहुंचाया जाएगा। जानकारों का कहना है इससे बाढ़ और सूखा दोनों पर नियंत्रण पाना संभव हो जायेगा।

उल्लेखनीय है कि वाजपेयी सरकार के समय इस परियोजना पर चर्चा शुरू हुई, तो पर्यावरणवादी संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया था। पूर्व यूपीए सरकार उन संगठनों के दबाव में आ गयी। विरोधियो का दावा है कि इस योजना से नदियों का प्राकृतिक रूप बिगड़ेगा, इलाको की कुदरती बनावट बदलेगी और बड़े पैमाने पर आबादी का विस्थापन होगा।

बेशक, यह अपेक्षित है कि सरकार उठने वाले ऐसी तमाम सवालों पर तार्किक एवं संतोषजनक जवाब पेश करे। मगर अकारण भय के आधार पर ऐसी योजना को छोड़ा नहीं जा सकता, जिसमे देश की स्थायी खुशहाली की संभावना छिपी है।

नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव पिछले सौ साल में कई बार आया। अगर उन पर अमल हुआ होता, तो आज देश की तस्वीर कुछ और होती। अच्छी बात है कि अब भारत में ऐसी सरकार है, जो साहसी योजनाओ को लागू करने का दमखम दिखा रही है।