भारत को अंग्रेजो से आज़ादी दिलाने के लिए आंदोलनों में महात्मा गाँधी की प्रेरणा से चले ‘असहयोग आंदोलन’ को प्रमुखता से याद किया जाता है।

मगर इतिहास लेखकों ने कभी नहीं बताया कि अंग्रेजो द्वारा बनाई वस्तुओ के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओ का उपयोग का मूल विचार कांग्रेस या महात्मा गाँधी का नहीं, बल्कि आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती का था। स्वामीजी ने सं 1875 में ही स्वदेशी आंदोलन की नीव रखते हुए भारतीय सामग्री के उपयोग का विचार दिया था।

सं 1857 के स्वंतत्रता संग्राम के बाद जब देश भर में अंग्रेजो के खिलाफ आक्रोश था, उसी दौर में स्वामी दयानन्द ने लोगो को अंग्रेजो की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कई लेख लिखे, लोगो को स्वदेशी का महत्व बताया और अंग्रेजो की वस्तुओ का बहिष्कार करने के लिए तैयार किया।

फिर 1875 में उन्होंने पहले आर्य समाज और फिर पुरे देश को स्वदेशी कपडे पहनने व स्वदेशी वस्तुओ का उपयोग करने को कहा। यह आंदोलन कुछ ही समय में देशभर में व्याप्त हो गया।

‘स्वदेशी आंदोलन’ की सफलता के सालो बाद सं 1920 के आसपास कांग्रेस ने इसे असहयोग आंदोलन के नाम से चलाया। बाद में इसे इस तरह प्रचारित किया गया जैसे ‘स्वदेशी आंदोलन’ का मूल विचार कांग्रेस का था, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था।