फिर एक और शाम ढल गयी
बातें थी वही बस स्याही बदल गयी!!

कन्हैया का माखन कुतुब को अखरने लगा
गाय की सादगी बकरी पर कुर्बान हो गयी!!

होली का रंग सुखा ही रह गया
बकरीद को धोते धोते नीर शर्मासार हो गयी !!

बालिष्ट बैल लड़ने के लिए लड़ रहा
सुडौल गाय बाजार में नीलाम हो गयी!!

दूर्गा माँ घर जाने को तरस गयी
ताज़िये के भीड़ में गलियां सिकुड़ गयी!!

मासूम बचपन कटघरे मे खडा है
पटाखे की रौनक अब प्रदूषण हो गयी!!

बस
अति हो चुकी
इति हो अब ……

शाम थी जो अब ढल गयी
स्याही अब नयी लेखनी रचेगी !!

गूंजेगा हर ओर स्वाभीमानी सनातनी नारा
देश की अब दिशा बदलेगी!!

जय भारती
Author: Sarita K Chamaria