भारत में अर्थव्यस्था में आई सुस्ती गंभीर बहस का विषय बन गई थी। वित्त वर्ष 2017 की पहली तिमाही में विकास दर के 5.7 रहने से भी अचानक धक्का लगा था। रिज़र्व बैंक ने भी वित्त वर्ष 2018 के लिए विकास दर का अनुमान 7.3 से घटाकर 6.7 कर दिया था। हालाँकि सरकार ने सरकारी घाटा जीडीपी के 3.2 फीसदी के स्तर पर सीमित रखने का लक्ष्य तय किया है लेकिन छोटी अवधि में यह हासिल करना मुश्किल हो सकता है।

नौकरियाँ पैदा करना, टैक्स से आय और अन्य सार्वजनिक कार्यक्रमों पर होने वाला खर्च अर्थव्यस्था में फिर से चुस्ती आने पर निर्भर करते हैं। आलोचक कह रहे हैं कि अर्थव्यस्था में आई सुस्ती सरकार की गलत नीतियों का परिणाम हैं। जबकि सरकार और उनकी नई नीतियों के समर्थको का कहना है कि सुस्ती ज्यादा देर नहीं रहेगी और इन सुधारो से देश में कामकाज के तरीको में पारदर्शिता आएगी और आने वाले कई वर्षो में विकास की ऊंची दर को हासिल करना संभव हो पाएगा।

भारत का टैक्स जीडीपी अनुपात 16:6 है जो कि उभरते हुए बाजार के औसत 24 प्रतिशत से बहुत कम है। यह कम टैक्स-जीडीपी अनुपात के कारण है क्योंकि अर्थव्यस्था में बड़े पैमाने पर काला धन लगा है और टैक्स ढांचा बहुत ही कमजोर है। नोटबंदी काले धन के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई थी लेकिन इस बात की गंभीरता को महसूस नहीं किया गया। अब देखिये कि जो पैसा बैंको के पास वापस आया है उसने  टैक्स चोरी करने वालों के पकडे जाने की संभावना निश्चित ही पैदा की है इस बात से इंकार नहीं किया जा  सकता है।

डेटा एनालिटिक्स के इस युग में किसी भी तरह के लेनदेन की पकड़ करना संभव है। नोटबंदी को पारदर्शी भारत के निर्माण के एक कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। नोटबंदी से पहले ही संसद ने बेनामी लेनदेन (निषेध) अधिनियम पास किया जिसके तहत अवैध तरीके से कमाए धन को रियल एस्टेट में खपाना मुश्किल हो जायेगा।

रियल एस्टेट रेगुलेशन एक्ट (रेरा) भी ऐसा ही एक बड़ा कदम है ताकि रियल एस्टेट में पारदर्शिता लाई जा सके। नोटबंदी, बेनामी एक्ट और रेरा जैसे कदमो के संभावित परिणाम यह होंगे कि भारतीयों की टैक्स चुकाने की आदत में बड़े पैमाने पर बदलाव आएगा। जल्दी ही काले धन पर और भी हमले देखने को मिल सकते हैं। भविष्य में काले धन को छिपाना असंभव हो जायेगा। इससे भारत में टैक्स-जीडीपी अनुपात बढ़ेगा।

जीएसटी भी एक बड़ा ढांचागत सुधार है और उसके लाभ निश्चित हैं। यह बात सच है कि फिलहाल जीएसटी बहुत जटिल है। मगर उसे आसान बनाया जा सकता है और अभी तक के अनुभवों से सीख ली जा सकती है। जीएसटी में टैक्स चुकाने वालो की संख्या खासी बढ़ेगी।

पैसो से जुड़े किसी भी तरह के कामकाज में आधार की अनिवार्यता कर दी गई है। अभी तक कई फर्जी राशन कार्डो की पहचान भी हो गयी है। आधार और पैन जोड़ने की पहल के बाद कई अवैध पैन कार्ड सरेंडर हो गए है। इन पैन कार्ड से टैक्स छुपाया जा रहा था या उसकी चोरी हो रही थी।

अनुमान है कि सरकार ने टेक्नोलॉजी आधारित इन कदमो के दम पर आने वाले 10 सालो में करीब 2 लाख करोड़ रूपए की बचत की तैयारी कर ली है। आधार से जुड़े डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर से फंड ठीक लोगो तक सही समय पर पहुंचेगा।

पिछले कुछ समय से सबसे बड़ा सुधार इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्टी कोड 2016 भी है। भारत में यह गंभीर समस्या हो गई है कि उघम तो बीमार हो जाता है लेकिन उसके प्रमोटर अमीर। इस नए कोड के जरिए इन प्रमोटर को अपनी संपत्ति बेचकर धन चुकाना होगा।