वर्ष 2015 की 29 जनवरी की घटना है| कर्नल एम एन राय अपने सहायक नौजवानों के साथ एक कॉन्बिंग ऑपरेशन के दौरान आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो जाते हैं| या यूं बोल दीजिए कि आत्मसमर्पण का झंडा लहरा कर कर्नल राय को धोखे से मार दिया गया| 30 जनवरी को उनके पार्थिव शरीर को पूरे राजकीय सम्मान के साथ एक शोकाकुल माहौल में विदाई दी जाती है| उनकी 12 बरस की लड़की अपने पिता को पूरे आर्मी के ठाठ से नम आंखों में सलूट करते हुए विदा करती है| यह क्षण को याद करके आज भी मेरी आंखें नम पड़ जाती हैं और दिवंगत शहीद कर्नल राय को याद कर कर सीना फुल जाता है| परंतु ठीक 15 16 दिन बाद देशवासी इस शहीद को भूलकर क्रिकेट वर्ल्ड कप के जिसको में डूब जाते हैं और भारत-पाकिस्तान की मैच वगैरा-वगैरा में खो जाते हैं|

वैसे मुझे इस बात से कोई आपत्ति नहीं, परंतु यह बात आप दिमाग में डाल दीजिए कि यह देश की वही पब्लिक है जिसने देश प्रेम और देश की सुरक्षा का सहारा ठेका सरकारों और फौजियों पर थोप रखा है|

आज जब मैं Facebook Twitter या कहीं भी किसी भी सोशल मीडिया पर एक ट्रेंड चलते हुए देख रहा हूं कि हर कोई अभिनेत्री स्वर्गीय श्रीदेवी के मौत के रहस्य के पीछे पड़ा हुआ है| कोई डॉक्टर बन चुका है, कोई पुलिस या जासूसी विज्ञान का महान व्यक्ति बना जा रहा है| आश्चर्य वाली बात तो यह लगती है कि अपने आप को बहुत बड़ा कट्टर हिंदू और राष्ट्रवादी बताने वाले यह फेसबुकिये भी इस समय श्रीदेवी के मौत के रहस्य को लेकर काफी चिंतित दिखाई दे रहे हैं|

यह सब देखने के बाद मुझे एक बात तो समझ में आ गई कि आखिर कांग्रेस ने 60 साल तक लोगों को कितना मानसिक गुलाम बना दिया है और किस तरह से इन पर राज किया| मैं यहां कांग्रेस पर आरोप नहीं लगा रहा परंतु इन मानसिक गुलामों पर सवाल उठा रहा हूं| अभी कुछ दिन पहले की घटना है कि देश के कई जवान सीमा पर शहीद हो गए| तथाकथित राष्ट्रवादी और हिंदूवादी सोशल मीडिया वालों ने बहुत चिल्ला पुकार किया, सरकार और मोदी तक को सीख दे डाली| अब इनमें से वहीं कुछ लोग हैं जो शायद श्रीदेवी के मौत पर भी सीबीआई जांच या एसआईटी जांच की मांग कर दें|

समस्या किसी पार्टी में नहीं समस्या तो आखिर खुद देश की जनता की मानसिकता पर है| श्रीदेवी मर गई, क्यों मर गई, कैसे मर गई, उसकी पर्सनल लाइफ क्या थी, जरा सोचिए क्या यह राष्ट्रीय मुद्दा है??? अब आप देश के पत्रकारों और टीवी न्यूज चैनलों को कुछ मत कहिए क्योंकि वह लोग अपना धंधा चमका रहे हैं वही दिखाते हैं जो बिकता है| बड़ी आश्चर्यजनक बात है कि देश में हिंदुत्व का नींव मजबूत करने वाले राष्ट्रीय नायक स्वतंत्र वीर सावरकर को भी हम आज भूल चुके| 26 फरवरी उनकी पुण्यतिथि थी।

कई साल पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने भारत की जनता की मानसिकता के ऊपर एक बहुत ही गंभीर घटना के ऊपर संसद में वक्तव्य दिया था|उन्होंने बक्सर की लड़ाई का उल्लेख करते हुए यह बताया कि किस तरह से मुट्ठी भर अंग्रेज सैनिक सिराजुद्दौला की सेना को हराकर जीत का जश्न मना रही थी और भारत की जनता उस समय भी उस जश्न को देखने के लिए तमाशबीन बनी थी| अगर उस समय उस मुट्ठी भर सेना और जश्न मनाते हुए अंग्रेजों को भारतीय जनता ने एक पत्थर उठाकर भी जवाब दिया होता तो देश अंग्रेजों का गुलाम कभी नहीं बनता| परंतु यही इस देश की कड़वी सच्चाई है कि हम मूकदर्शक बने बैठे रहते हैं क्योंकि हमें तमाशा देखने में ज्यादा दिलचस्पी है, फिर चाहे कोई हमें गुलाम ही क्यों ना बना दे| आज भी यह घटना उतनी ही सत्य है जितनी कि 300 वर्ष पूर्व थी| आज भी हम उतने ही बड़े मानसिक गुलाम है|

शायद यह कड़वी सच्चाई हर कोई स्वीकार ना करें|