“नासमझ और जाहिल हिंदुस्तानियों ने अपने इतिहास से कुछ भी नहीं सीखा, जब जब यह लड़े हैं भाषा, मजहब और जाति के नाम पर किसी बाहर वाले ने आकर इन पर हुकूमत किया, आज भी यह लड़ रहे हैं उन्हें लड़ने दो, इन्हें जितने भी हथियार चाहिए मैं उन्हें दूंगा”

1987 में रिलीज हुई बॉलीवुड की फिल्म मिस्टर इंडिया का मोगेंबो द्वारा कहां गया यह फेमस डायलॉग है| यह डायलॉग आज भी वर्तमान परिस्थितियों में एकदम सटीक और सही साबित होता है| फिल्म को रिलीज हुए 30 साल हो गए आज हम समझदार भी हो गए हैं और इतने जाहिल भी नहीं रहे, परंतु परिस्थितियां अभी भी वही की वही है| किसी छोटी बात को लेकर जातिवादी लड़ाई होना अभी भी आम बात है।

कुछ ऐसी ही परिस्थिति भारत के सर्वोत्तम प्रगतिशील माने जाने वाले महाराष्ट्र प्रदेश की हुई है, एक पुश्तैनी मतभेद को लेकर हुई दलित और अगड़ी जातियों में मतभेद अब जातिवाद संग्राम का रूप ले चुका है| और इस मतभेद को एक बड़ा संग्राम का रूप देने के लिए भारत विरोधी ताकतों और कुछ राजनीतिक पार्टियों ने पूरा मंसूबा बना रखा है|

सन 1818 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा महाराष्ट्र में पेशवा शासकों पर हुई जीत को कुछ दलित संगठन विजय दिवस के रुप में मनाते हैं| इन दलित संगठनों का मानना है कि पेशवा राज एक मनुवादी सोच वाला राज्य का जिसने दलित समुदाय पर अन्याय किया था| इसमें कितनी सच्चाई है इस पर हम बाद में आते हैं| परंतु जरा यह दलित संगठन मुझे यह बता दें कि अंग्रेजों ने तो भारत के हर समुदाय और वर्ग पर अन्याय किया था तो उनकी जीत पर जश्न मनाना कहां तक उचित होगा? और अगर अंग्रेजों के जीत पर इनको जश्न ही मनाना है तो ऐसे लोगों को 15 अगस्त या 26 जनवरी जैसे त्योहारों से क्या वास्ता रह गया??? अब मैं आपको बताता हूं इस खेल के पीछे की राजनीति को।

दरअसल नए नवेले सपोले नेता जिग्नेश मेवानी और भारत विरोधी अपराधिक अलगाववादी मानसिक वाले उमर खालिद ने कुछ दिन पहले महाराष्ट्र स्थित पुणे में दलित समुदाय के बीच सरकार और देश विरोधी नारे लगाए एवं वहां की जनता को भड़काने का काम किया| यह बात तो अब किसी से छुपी नहीं है कि गुजरात में मिली छोटी सी सफलता को कांग्रेस एक विजय फार्मूला बनाकर ऐसे सपूतों को पाले हुए हैं और देश में हर जगह इस तरह की जाती वादक संग्राम को बढ़ावा दे रही है| हार्दिक पटेल, अल्पेश, जिग्नेश, उमर खालिद और कन्हैया कुमार जैसे सपोले असल में कांग्रेस के प्यादे हैं जिसे कांग्रेस अपने फायदे के लिए किसी भी हद तक इस्तेमाल करना चाहती है|

दूसरी और अब मैं बात करूंगा भाजपा के शासन और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के रवैया की| कई सारे प्रश्न हैं जो उनके नेतृत्व पर उठ रहे हैं| आखिर जिग्नेश मेवानी और उमर खालिद जैसे सपोले को पुणे जाने ही क्यों दिया गया? पुणे में हुई जातिवाद एक दंगे में एक व्यक्ति मारा गया और कई घायल हो गए| ऐसी घटना की पहले से इंटेलिजेंस रिपोर्ट थी तो कार्यवाही क्यों नहीं की गई?
और अंततः इस आग को भारत की आर्थिक राजधानी एवं महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई तक क्यों फैलने दिया गया?

आज भी भाजपा के कुछ नेताओं को यह समझ में नहीं आ रहा कि जमीन स्तर लीडरशिप को चुस्त दुरुस्त करने की जरूरत है और शासन को हाथ में डंडा लेकर चलाने की जरूरत है| हर बार मोदी संकटमोचक बनकर नहीं आ सकते वह अन्य कार्यों में भी ज्यादा व्यस्त रहते हैं|

इस पूरे प्रकरण में शिवसेना और उद्धव ठाकरे की चुप्पी कई प्रश्न उठाती है| जो शिवसेना एक समय महाराष्ट्र के राजनीति पर पूरी तरह हावी थी और महाराष्ट्र बंद एवं मुंबई बंद जैसे चीजों में अग्रसर रहती थी आखिर उसने दूसरे संगठनों को इतना आगे कैसे बढ़ने दिया कि आज वह लोग भी महाराष्ट्र के सीने पर चढ़कर एक सफल बंद आयोजन कर रहे हैं? बात कुछ गले के नीचे हजम नहीं होती| आज भी मुंबई बंद का आह्वान किया गया है देखते हैं यह कितना सफल रहता है या सरकार इसे फेल कर पाएगी|

इस लेख की अगली कड़ी में आपको और गहराई से महाराष्ट्र के जातीय संग्राम के एक एक पहलू बताने की कोशिश करुंगा|