यूं तो इतिहास की पीठ पर वक़्त की बहुत सी खरोंचे है , लेकिन कुछ निशान इतने गहरे है की मिटाए नहीं मिटते। ऐसे ही निशान भारत का बंटवारा कर एक अलग देश पाकिस्तान बनाने के समय के है, जिनके क्रूर किस्से रह-रहकर किताबो से बाहर आ निकलते है।

ऐसा ही एक किस्सा है जो पाकिस्तान की इस करतूत को उजागर करता है कि ‘जब बंटवारे के समय लाहौर में हिन्दुओ और सिखों को बुरी तरह काटा-मारा जा रहा था, तब पाकिस्तान के नेताओ ने दंगे शांत करवाने के बजाय अपनी पुलिस  भेजकर और भड़काए थे।’

जबकि इसके उलट भारत में हो रहे दंगे रोकने के लिए गांधीजी अनशन पर बैठ गए थे , लिहाजा दंगे रुक गए थे। 

किस्सा 16 अगस्त 1947 और उसके बाद के दिनों का है।  भारत की बेशकीमती उपजाऊ जमीन  को काटकर एक अलग देश पाकिस्तान बना दिया गया था। पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दू व् सिख भारत आ रहे थे तो भारत में रहने वाले मुसलमान पाकिस्तान जा रहे थे। दोनों ही ओर के लोगो के सिर पर खून सवार था। 

भारतीय सीमा में बसे अमृतसर और उसके आसपास के  इलाको में रहने वाले मुसलमानो को सुरक्षित घेरा बना कर लाहौर की ओर रवाना कर दिया। जबकि इसके उलट लाहौर से जो हिन्दू व् सिख अमृतसर आने के लिए निकल रहे थे, उन्हें पाकिस्तानियो ने घेरकर मारना-काटना शुरू कर दिया।

अंग्रेज अधिकारी पेटे रीज ने बाद में लिखा कि ‘मुझे आश्चर्य हुआ की लाहौर में क्रूरता करने वाले हत्यारो को पुलिस ने रोका नहीं, बल्कि कई जगह मैने देखा कि स्वयं पुलिस वाले अपने सरकारी हथियारों से नृशंस नरसंहार में शामिल हो गए। पुरुषो, बुजुर्गो को काट डाला गया, जवान लड़कियों का अपहरण कर लिया गया और बच्चो को भूखा प्यासा मरने के लिए छोड़ दिया गया। यह देखना मेरे लिए शर्मनाक था।’