भारत में धर्मांतरण नया मसला नहीं है। सदियों से यह कभी दबे-छुपे तो कभी खुलकर तथा कभी प्रलोभन के जरिये तो कभी सेवा के माध्यम से होता रहा है।

तथ्य कहते है धर्मांतरण में सर्वाधिक उपयोग उन आदिवासी समुदायों- जातियों का किया गया, जो भारत की मूल चेतना में बसे हुए थे। उनकी गरीबी, शिक्षा की अनुपलब्धता और स्वास्थ्य संबधी चिंताए धर्मांतरण का सबसे पुख्ता आधार बनती चली गई।

मगर एक आदिवासी नेता इतनी प्रखर दृष्टि के साथ भारत के मूल विचार के साथ खड़े रहे कि उन्होंने अपने समय में धर्मान्तरण की रणनीतियों को ध्वस्त कर दिया। ये महान व्यक्ति थे जयपालसिंह मुंडा

किस्सा 1930-40 के दशक का है। सिंह प्रखर चेतना वाले एक समझदार मुंडा आदिवासी थे। उन्हें ईसाई मिशनरियों ने बेहतर पढ़ाई के लिए अपने खर्च पर ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय भेजा। मंशा थी कि मेधवान सिंह ऑक्सफ़ोर्ड से पढ़कर लौटेंगे और भारत में अपने मूल आदिवासी समुदाय को उस दिशा में ले जायेंगे, जिस दिशा में चर्च उन्हें ले जाना चाहता था।

मगर सिंह परिपक्व विचार थे और इस रणनीति को समझते थे। ऑक्सफ़ोर्ड पहुंचकर उन्होंने एक अच्छे हॉकी खिलाडी के रूप में ख्याति अर्जित की और भारत लौटे तो आदिवासियों को एकजुट करने में जुट गए। उन्होंने ईसाई मिशनरियों के बताए रास्ते पर चलने के बजाए अलग रास्ता चुना और सं 1938 में आदिवासी महासभा का गठन किया।

बाद में वे चुनाव लड़े और संसद भी पहुंचे। उन्होंने अपने क्षेत्र अर्थात बिहार-झारखण्ड के आदिवासियों के लिए ही नहीं, बल्कि समूचे भारत के आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। लेकिन आदिवासियों को अपने मूल धर्म, पूजा पद्धति, धार्मिक परम्पराओ से अलग नहीं किया। यह सिंह की जीत थी और उनका उपयोग करने वाली रणनीति की हार।