भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जुड़े ऐसे कई प्रसंग है, जो बताते हैं कि उनका चित्त कम स्थिर रहा। विदेशो में अंग्रेजी माहौल के बीच गुजरी युवावस्था के दौरान उनके व्यक्तित्व में ऐसे तत्व आ गए थे, जो गंभीर से गंभीर मुद्दे पर भी उन्हें गंभीर नहीं रहने देते।

ऐसा ही एक वाकया है, जिसमे भयावह बीमारी के कारण के अंग्रेजो द्वारा जेल से छोड़े गए गांधीजी को मुंबई में ठहराए जाने के दौरान वे अपने पिता मोतीलाल नेहरू के साथ गांधीजी की सेवा छोड़ मनोरंजन में लग गए थे।

किस्सा सं 1924 का है। अंग्रेजों ने तब महात्मा गाँधी को जेल में डाल दिया था। मगर जब बापू की तबियत बिगड़ी तो उनकी सजा कम कर अंग्रेज सरकार ने उन्हें आराम करने के लिए बम्बई भेज दिया। बापू यहाँ भी आराम के बजाय देश को आजादी दिलाने के बारे में चर्चा करते रहते। इसी दौरान नेहरू अपने पिता के साथ बम्बई पहुंचे और दोनों बापू की सेवा के लिए कुछ हफ्तों तक वहीँ रुक गए।

उन दिनों गांधीजी गंभीर योजनाओ पर बेहद जरुरी चर्चा करना चाहते थे, मगर जवाहरलाल नेहरू अक्सर वहां नहीं मिलते। वे कभी बम्बई के समुद्री बीच पर घुड़सवारी करने निकल जाते तो कभी लम्बी दौड़ के लिए भी निकल जाते और इधर मोतीलाल नेहरु और बापू उनका इंतज़ार करते रहते।

सालो बाद जब नेहरू ने अपनी आत्मकथा लिखी तो उन्होंने स्वीकारा कि मुझे वहां देश की समस्याओ पर चर्चा करनी चाहिए।