किसी भी शासनाध्यक्ष का किसी एकाध कमजोर पल में असावधान हो जाना, उस राष्ट्र को कितना भारी पड़ सकता है, इसका उदहारण भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पेश किया था। अमेरिका के विदेश सचिव के साथ हुई एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक में उनका बुझा-बुझा सा बर्ताव तब देश के लिए बहुत नुकसानदेह साबित हुआ था।

उस एक घटना से हुए कूटनीतिक घाटे से उबरने में भारत को कई दशक लगे, बल्कि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि उस एक घटना के बाद से वैश्विक रूप से भारत की स्थिति में काफी नकारात्मक बदलाव आ गया था।

किस्सा सं 1953 का है। तब नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे और भारत एक लोकतान्त्रिक देश के रूप में विश्व में सम्मान हासिल कर रहा था। मगर पाकिस्तान की ओर से कश्मीर में लगातार संकट पैदा किया जा रहा था। ऐसे में कश्मीर मामले को लेकर अमेरिका ने भी प्रयत्न शुरू किए। उस दौर में भारत और अमेरिका के बीच कुछ मतभेद थे।

हालाँकि उन्ही मतभेदों के बीच अमेरिका के विदेश सचिव डलेस नेहरू से मिलने दिल्ली आए। डलेस इस तैयारी से आए कि वे नेहरू से पूरी गर्मजोशी से मिलेंगे और संबंधो में आए तनाव को खत्म करने करते हुए इन्हे सुधारने का प्रयास करेंगे।

मगर जब वे नेहरू से मिले तो निराश हो गए। दरअसल, डलेस को कुछ देर तक बातचीत के बाद एहसास हुआ कि नेहरू उनसे बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं और ऊँघने लगे हैं। डलेस को यह बात बहुत बुरी लगी और उसके बाद जो हुआ, भारत को उसका कई दशकों तक भारी खामियाजा भुगतना पड़ा।

दरअसल, डलेस उसके कुछ ही दिन बाद पाकिस्तान गए। उन्होंने पाकिस्तान से वह संधि कर ली, जिसके तहत अमेरिका ने पाक को हथियार व सैन्य सहायता देने की बात की। पाकिस्तान के तत्कालीन नेताओ ने डलेस का पूरी गर्मजोशी से स्वागत किया। डलेस इससे पाक की ओर खूब झुके।

बाद में कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे मोरारजी देसाई ने अपनी आत्मकथा में लिखा भी कि “यदि जवाहरलाल नेहरू उस समय अपने पूर्वग्रह को छोड़कर डलेस से मिलने में गर्मजोशी दिखाते तो स्थिति कुछ दूसरी ही होती और भारत में आए कई अनिष्ट परिणामो से बच जाता।”