भले ही अब हैदराबाद भारत का अभिन्न हिस्सा हो, लेकिन आजादी के ठीक पहले एक समय ऐसा था, जब वहां के निजाम ने अपने अलग देश की घोषणा कर दी थी। हैदराबाद का निजाम अपनी रियासत का भारत में विलय नहीं चाहता था और इसके लिए उसे पाकिस्तान के अलावा ब्रिटेन और अमेरिका भी उकसाते हुए मदद दे रहे थे।

मगर सबसे ज्यादा आश्चर्य तो यह था कि ‘ अपने कुछ बयानों में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी ऐसे संकेत दे चुके थे, मानो हैदराबाद को अलग देश मान लिया हो’।

नेहरू के ऐसे दो बयान है, जिनसे हैदराबाद को स्वात्यता के संकेत चले गए थे। हालांकि बाद में नेहरू ने तुरंत इनमे  सुधार किया। एक तो तब जब नेहरू ने 24 अप्रैल 1948 को हुई कांग्रेस पार्टी की मीटिंग में कह दिया था “हैदराबाद के पास दो ही विकल्प है – युद्ध या विलय”।

इस बयान से दुनियाभर में सन्देश गया कि भारत हैदराबाद को एक अलग देश या रियासत मान चुका है। इस पर नेहरू की आलोचना भी हुई और उन्हें तुरंत अपने बयान को स्पष्ट करना पड़ा।

दूसरी बार यह भ्रम तब पैदा हुआ जब सरदार पटेल द्वारा नेहरू को पर्याप्त संज्ञान में लाये बिना हैदराबाद में भारतीय सेना भेजकर जबरदस्त कार्यवाई कर दी गयी। इससे घबराये निजाम ने तुरंत आत्मसमर्पण किया और हैदराबाद के भारत के विलय के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिए। मगर नेहरू यहाँ पर फिर एक गलती कर गए।

तब वे फ्रांस की राजधानी पेरिस में थे। उन्होंने वही से 27 अक्टूबर 1948 को तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल को एक पत्र लिखा, जिसमे उन्होंने फिर हैदराबाद को एक अलग देश मानने की भयंकर भूल कर दी।

उन्होंने लिखा -‘यह बड़े ही सौभाग्य की बात है कि हमने इसे झट से निपटा दिया। वरना अपने देश के अलावा दुनियाभर में हमारे बारे में बहुत बुरी प्रतिक्रिया होती”।

आगे वे लिखते है -” सबकुछ सबको समझा पाना बहुत मुश्किल होता है और हैदराबाद पर हमारी सेना द्वारा कार्यवाई किए जाने से यह सन्देश जाने का डर था कि एक बड़े देश ने अपने एक छोटे देश पर हमला कर दिया”।

नेहरू के इस वाक्य में बड़ा देश भारत और छोटा देश हैदराबाद कहा गया था। यह एक गंभीर भूल थी और वह भी बाकायदा प्रधानमंत्री द्वारा गृहमंत्री को भेजे गए लिखित दस्तावेज में।

मगर सरदार वल्लभाई पटेल ऐसी बातों के बाहर आने के खतरों को जानते थे। इसलिए उन्होंने पत्र उजागर नहीं किया। हालांकि बाद में यह अंदेशा जताया गया कि यदि इस पत्र के बारे में तब खुलासा हो जाता तो पाकिस्तान या ब्रिटेन, अमेरिका सहित कई अन्य देश इसे भारत के खिलाफ सयुंक्त राष्ट्र में शिकायत का एक मुद्दा बना सकते थे

वैसे भी पाकिस्तान ने तीन बार 6 अक्टूबर, 21 नवंबर व् 6 दिसंबर 1948) हैदराबाद का मामला सयुंक्त राष्ट्र में उठाया था।