जब कभी पर्यावरण सुधार की बात होती है, तब स्पेसिफिक रूप से नहीं कहा जा सकता की ‘देखिये ये 10  काम हुए है और वे 15 काम बाकि  रह गए है।’

पर्यावरण सुधार एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमे दशकों के परिश्रम के बाद सफलता मिलती है और जमीन पर कुछ दिखाई देने लगता है।

मध्यप्रदेश ने अपने पर्यावरण और प्रकृति को लेकर बीते डेढ़ दशक में काफी कुछ ऐसा किया है, जिसे प्रदेश में नहीं बल्कि देश और दुनिया में भी सुर्खियां मिली है।

मसलन यह मध्यप्रदेश ही है, जिसने अपने विशाल वनक्षेत्र और उसमे स्वछंद विचरण करने वाले वन्य प्राणियों को काफी हद तक जंगल  माफिया और शिकारियों से बचाये रखा।

यह मध्यप्रदेश ही है जिसके नाम एक दिन में सर्वाधिक पौधे रोपने का विश्व रिकॉर्ड है।

निश्चित ही यदि उन पौधों में से कुछ प्रतिशत ख़राब भी हो गया होगा या नहीं पनप सके, फिर भी जो पनपे है वे भविष्य में पेड़ बनेंगे और प्रदेश का वातावरण सुरक्षित रखने में मदद करेंगे।

पर्यावरण के कारण आम जनता के जीवन में जो गुणात्मक सुधार हुए है और इन सुधारो से नदी, पहाड़, वन, आदि का जो दोहन संतुलित ढंग के किया गया है, उसे भी पर्यावरण सुधार   की दृष्टि से ही देखा जाना चाहिए। मध्यप्रदेश में तो  पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. अनिल दवे ने  माँ नर्मदा और पर्यावरण को लेकर ऐसी अलख जलाई, जो अब तक प्रज्ज्वलित  हो रही है।

दूसरी ओर, देश में दूसरा ऐसा कोई राज्य नहीं है, जहाँ के मुख्यमंत्री अपनी नदी-सभ्यता के प्रति इतने संवेदनशील हो, जितने की शिवराज चौहान है। जिस राज्य का मुख्यमंत्री स्वयं को माँ नर्मदा के बेटा कहता हो, वहां फिर नदी का शोषण नहीं हो सकता।

मध्यप्रदेश भौगोलिक दृष्टि से कहीं बड़ा है। यहाँ का वनक्षेत्र भी बहुत सघन और फैला हुआ है।

ऐसे में उसकी रक्षा करना, और अवैध कटाई होने से बचाना अपने आप में बड़ा टास्क है। मध्यप्रदेश में बीते वर्षो में यह कर दिखाया है, क्योंकि यहाँ वनक्षेत्र में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है।

प्रदेश के जंगलो में अवैध कटाई तथा अतिक्रमण की रोकथाम हेतु सेटेलाइट से निगरानी करने की योजना लागु की गयी, जिसे क्लाउड बेस्ट सर्विलांस सिस्टम कहा गया। इसके तहत सरकार प्रतिवर्ष सर्वेक्षण करवाकर नक़्शे भी तैयार करवाएगी।

प्रदेश के लिए यह सुखद है की भारतीय वन सर्वेक्षण की वर्ष 2017 की रिपोर्ट में जबलपुर व ग्वालियर जिलों में क्रमशः 25 व 12 प्रतिशत हरियाली में वृद्धि बतलाई गई।

यदि कोई सरकार पर्यावरण का साथ लेते हुए जनता के विकास के प्रयत्न करे, तो उसकी सराहना की जानी चाहिए। मप्र ने ऐसा कर दिखाया है।