आज से 125 बरस पहले एक युवक पश्चिम से पूरब की ओर लौट रहा था, और एक  दूसरा युवक पूरब से जा रहा था पश्चिम की ओर। पहले युवक थे अरविन्द घोष जो बाद में महायोगी श्री अरविन्द के रूप में विश्वविख्यात हुए। और दूसरे युवक थे स्वामी विवेकानंद, जिन्होंने पश्चिम में भारतीय मेधा का उद्घोष किया था। इन दोनों युवको के जहाज आमने सामने हुए थे, दोनों आपस में मिले तो नहीं, किन्तु इन दोनों ने भारत के भविष्य का जो प्रारूप हमें सौपा है, उसे अनदेखा करते हुए हम जितनी दूर निकल जाएंगे, हमारा दुर्भाग्य उतना ही परसता चला जाएगा।

स्वामी विवेकानंद की कहानी युवा संघर्ष की कहानी है। यह संघर्ष धर्म की चौखट पर जरूर है, लेकिन वह मनुष्य जाति की संपूर्ण विजय के लिए है। भूख, दरिद्रता,डर, जड़ता ,मोह, दुर्बलता, और काम वासना के कीचड़ में धंसे हुए मनुष्य को बाहर निकालने का जोरदार प्रयत्न किया था स्वामी विवेकानदं ने।

यह उस भारतीय युवा का आह्वान था, जो उच्चतम गुरु-शिष्य परंपरा से आया था। इतने आत्मविश्वास के साथ अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए विवेकानंद के अतिरिक्त किसी और को हमने नहीं देखा।

विवेकानंद कभी अतीत में नहीं गए। वे सदैव वर्तमान से लड़ते हुए दिखाई दिए। उन्होंने परंपरागत अध्यात्म का राग अलापने की अपेक्षा जीवन की सुंदरता को अपना विषय बनाया और बेहद शक्तिशाली विचारों  से युवाओ में प्राण फूंक दिए।

हिंदुत्व   की चीख पुकार मचाने  की अपेक्षा उन्होंने हिंदुत्व को चरितार्थ कर विश्व के सामने जो तस्वीर पेश की, उसने हमारे भीतर के स्वाभिमान को जगाया और हमें वह अपूर्व आत्मविश्वास दिया, जिसकी सदियों से दरकार थी। 

उन्होंने हिमालय की कंदराओं में छुपकर  तपस्या में लीन होने की अपेक्षा भारत के अगणित दरिद्रनारायणों के हृदय  उतरना ज्यादा उचित समझा। इसके लिए अपने गिरते हुए स्वास्थय के बावजूद उन्होंने भारत भ्रमण किया। वे जितने अंदर थे, उतने ही बाहर। 

उन्होंने कोई राजनितिक भाषण नहीं दिए, लेकिन राष्ट्रीय चेतना के लिए कर्मयोग की दीक्षा देकर युवाओ में आग पैदा की।  नेताजी सुभाषचंद्र बोस में कहीं लिखा है कि ‘ स्वामी विवेकानंद का धर्म राष्ट्रीयता को उत्तेजित करने वाला धर्म था। नई पीढ़ी के लोगो ने उन्होंने भारत के प्रति भक्ति जगाई, उसके अतीत के प्रति गौरव और भविष्य के प्रति आस्था उत्पन्न की।’

स्वामी विवेकानंद ने युवाओ को हर हाल में शान से जीने की प्रेरणा दी, धर्म के नाम पर  छल और आडंबर से मुक्त होकर मानवता के धर्म के लिए अपना  सर्वस्व न्यौछावर करने का भाव जगाया।

उन्होंने  चरित्रवान युवाओ के उस बड़े संगठन की आवश्यकता बताई, जिसके कंधो पर बैठकर भारत में बसी हुई सब जातियां, सब धर्म एक साथ ऊपर उठने  का साहस बटोर सके। 

युवा दिवस का अर्थ है- युवा चरित्र की संक्रांति का शुभ मुहूर्त। युवाओ की सभ्यता के सूर्य को हमारा नमस्कार।